Thursday, February 12, 2009

ढलता दिन और तेरी याद ....

ढलते दिन में शाम होने के साथ किसी की याद आती है ,
डरते हैं नाम लेने से उसका की कहीं नज़र लगे उससे ,
चाय का सहारा था वोह मेरी जब भी पीने बुलाती थी ,
काम छोड़ के उसके पास पहुंच जाता था जिसकी याद आती है ...


दिन ढलता है आज भी , और भी शाम होती है ,
चाय भी बनती है दोस्त भी मिलते है ,
पर वोह हसी , वोह काम में फसी ,
वोह मीठी सी मुस्कराहट लिए सामने बैठी एक परी ,

अब नही मिलती
चाय के साथ शाम के बाद ...

दिन ढल रहा है , और हो रहा है वक्त पीने का ,
मचल रहा है दिल फ़िर उससे मिलने को ,
फ़िर से उमर रही है दिल में तरंगे उसके ख्याल से ,
जी उठा हूँ फ़िर में तेरे एहसास aसे ,
पूछते है मुस्कुरा के मेरे दोस्त यह अक्सर ,
क्यूँ मुस्कुरा जाता है प्याली को देखकर ,

एक प्याले चाय में जो है तेरी तस्वीर छुपी ,
पर
शायद नही समझेंगे तेरे अक्स को जिसमे मेरी जान है बसी ....

शाम ढल रही है और हो रहा hai वक्त ,
अब जाने तुझे में याद भी हूँ की नही ,
अभी भी वोह :२२ से :५३५ से बीच का घंटा याद है ,
और बजे टर्मिनल पर चाय का कौपौन लेकर रखना ,
वोह तेरी दही पूरी भी याद है और चाय के दो तीन दौरे भी ...
और याद है मुझे वोह तेरा चाँद लम्हों पहेले जाना ,
फ़िर जल्दी में चाय पी केर बस के लिए जाना ....

लंबा वक्त हो गया शायद , पर किसी ने कुछ बताया नही ,
उमर गुज़र गई पर लगता है रूह वहीँ जम गई ,
उस्सी शाम की चाय ने केर दिया बेबस आज हमने इतना ,
की चाय का प्याला होठो तक आता तो है ,
पुराने लम्हे याद दिलाता तो है , पर नही होता नशा चाय में ,
नही होता नशा अब चाय में चाय का ,
यादो ने बेचारी चाय का वोह हक भी चीन लिया ...

याद तो हेर प्याले में हम आयेंगे ही ,
रूह छोड़ के आए है हम उन्ही वीरानो में अपनी ,
भटकी है जहाँ चाय की तलाश में दोस्त मेरी ,
मिलती है आज भी शानदार चाय उसको वहीँ पर ,
और एहसास रहता होगा कहीं पर ,
पलट के देखना दोस्त कभी ,
हम भी उस्सी प्याले में मुस्कुराते मिलेंगे .....

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